चातुर्मास में सभी छोटे-बड़े कार्यक्रम सादगी पूर्ण हों : बाबू भाई मेहता








–पूर्व कॉर्पोरेटर एवं धर्मनिष्ठ सामाजिक व्यक्तित्व की भारत के सभी जैन समाज से भावनात्मक विनम्र निवेदन के साथ अपील

 


बेंगलूरु। देश भर में जैन समाज की विभिन्न सभा, संस्थाओं आदि के अध्यक्ष, सभी ट्रस्टीगणों एवं समाज के सभी सूप्रतिष्ठित श्रावकगणों से महाराष्ट्र के सोलापुर से पूर्व कॉरपोरेटर एवं जाने–माने समाजसेवी भामाशाह बाबूभाई मेहता ने जैन धर्मावलंबियों के आगामी चातुर्मासिक पर्व को सादगी पूर्वक मनाने की विनम्र अपील की है। उन्होंने कहा कि चातुर्मास में सभी छोटे-बड़े कार्यक्रम सादगी पूर्ण होने चाहिए। बाबू भाई मेहता ने बताया कि जैसे–जैसे कोरोना खत्म होने की राह पर है, वैसे–वैसे चातुर्मास का समय भी नजदीक आ रहा है। संत महात्माओं के चातुर्मास जहां होते हैं, वहां श्रावकों में विशेष उमंग उल्लास और उत्साह होता है। साधु भगवंतों को भी 4 महीने, आत्म कल्याण की साधना के लिए समय मिलता है।

मगर, कुछ बड़े-बड़े आचार्य भगवंत, बड़े-बड़े शहरों में चातुर्मास करना चाहते हैं और वहां के बहुत से श्रावक, श्रीसंघ अपनी प्रतिष्ठा के लिए भी, ऐसे आचार्य भगवंतों के चातुर्मास करवाते हैं। चातुर्मास की सफलता, कितना खर्चा किया, कितने न्यूज़ पेपरों में चातुर्मास के विज्ञापन छपे, कितना डेकोरेशन किया, किस नेता को बुलाया.. इत्यादि इसी में अपनी प्रतिष्ठा मानते हैं। जबकि भगवान ने इसे आडंबर फरमाया है। मगर, जैसे ही माहौल ठीक हो जाएगा वापस हमारे कुछ श्रीसंघ वापस आडंबर के हिसाब से चलेंगे, क्योंकि हमने तो आडंबर को ही धर्म मान लिया है..! उन्होंने कहा कि "अगर हम आडंबर पर रोक लगाएं तो हर साल देश में कम से कम 20 से 25 स्कूलें, कॉलेजेस, हॉस्पिटल (जो आज के समय की जरूरत है और इस कोरोना काल ने हमें बता दिया है) खोल सकते हैं, ताकि हमारी भावी पीढ़ी इस मिशनरी स्कूल से, इसाईयत से दूर रहे, ताकि संस्कृति बनी रहे।" बकौल बाबूभाई मेहता, हमारे बच्चे हमारा भविष्य है और उनमें ही संस्कार नहीं होंगे तो, हमारे मंदिरों, उपाश्रयों, स्थानकों को कौन संभालेंगे। हम हमारे चातुर्मास एवं सभी धार्मिक कार्यक्रम सादगी से व आडंबर रहित करेंगे तो अच्छा रहेगा। उन्होंने कहा कि जितनी जरूरत है, उतना ही खर्चा करेंगे तो अच्छा रहेगा। समय बदल रहा है कुछ ज्यादा ही दिखावे से, अन्य समाजों में गलत मैसेज जाता है, इसलिए हमें चातुर्मास के निमित्त व धार्मिक कार्यक्रमों के निमित्त, कुछ तो आचार संहिता बनानी ही होगी।

इसी क्रम में अपने सुझाव है देते हुए उन्होंने बताया कि किसी भी तरह की पत्रिका नहीं छपवायेंं अर्थात् व्हाट्सएप–सोशल मीडिया में ही पत्रिका भेजे, इससे ज्ञान की आशातना भी नहीं होगी। क्योंकि कुछ समय बाद लोग ना, चाहते हुए भी इसको रद्दी में डाल देते हैं और यह हकीकत है। प्रवेश के दौरान रास्ते पर कोई भी हालत में नाचे नहीं और ना ही ढोल या बैंडवालों के सर के ऊपर पैसे फिराकर देवें। चातुर्मास प्रवेश का विज्ञापन पावपेज से ज्यादा ना हो। बड़े-बड़े मेट्रो सिटी में किन गुरु भगवंतों का चातुर्मास कहां पर है, यह मालूम पडने के लिए सिर्फ प्रवेश के दिन ही पैब्लिसिटी हो, क्योंकि इससे संघों में कॉन्पिटिशन बढ़ रहा है। मेहता ने कहा कि कोई भी टाइप की तपस्या निमित्त वरघोड़ा नहीं निकाले तो अच्छा रहेगा, क्योंकि अनेक शहरों में ट्राफिक बहुत बडी समस्यायेंं है, जिससे अनेक लोगों को दुविधाओं का सामना करना पड़ता है। साथ ही उन्होंने कहा कि प्रभावना की भी लिमिट श्रीसंघ को बांध देनी चाहिए, किसी भी प्रकार की प्रभावना एक शगुन के रूप में होनी चाहिए। राष्ट्रीय ही नहीं अंतराष्ट्रीय स्तर पर सुविख्यात रियल एस्टेट क्षेत्र सक्रिय धर्मनिष्ठ, समाजिक एवं राजनीतिक व्यक्तित्व बाबूभाई मेहता ने संयम पथ पर आरूढ़ हो चुके आचार्य भगवंतों, संतवृंदों आदि से भी इसी प्रकार की विनंती की है। उन्होंने कहा कि यही नहीं उनकी जवाबदारी भी है कि वे स्वयं इस दिशा में पहल करके श्रीसंघ के माध्यम से चातुर्मास एकदम सादगी से कराने में भागीदारी सुनिश्चित करें। सभी जैन संघटना या मंडलों को भी इस विषय में आक्रमता से आगे आना होगा कि चातुर्मास आडंबर रहित हो। मेहता बोले, निश्चित तौर पर यह समय की मांग है, क्योंकि नई पीढ़ी की रुचि इसमें कम है। कोरोना वापस आएगा या नहीं, हम कोई कह नहीं सकते, चूंकि इस कोरोना काल ने जैन समाज की आर्थिक परिस्थितियों पर भी आघात किया है। 20 फीसदी समाज के लोगों को छोड़ दिया  तो 80 प्रतिशत जैन बंधु इससे प्रभावित हुए हैं, इनकी चिंता भी हमें ही करनी है। परिवर्तनशील समय बड़ा नाजुक है। दुर्भाग्यवश राजस्थान, तमिलनाडु, कर्नाटक में विगत वर्षो में जो कुछ भी घटित हो रहा है वह चिंतनीय है, ऐसे में हमें फिजूल आडंबर करके, हमारे अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी नहीं लगानी चाहिए। इसका चिंतन हरेक संघ और समाज के शुभचिंतकों को करना जरूरी है।