94 वर्ष पूर्व 26 अक्टूबर का वह दिन जब 'बूंद' बना 'मोती', जीवनदायिनी गंगनहर लाने वाले महाराजा गंगासिंहजी को आज भी याद करता है पूूरा मरुक्षेत्र...




CK NEWS/CHHOTIKASHI बीकानेर : कहा जाता है कि जिस तरह राजा भगीरथ ने एक शाप से भस्म हुए हजारों सागरपुत्रों के उद्धारार्थ पीढिय़ों से चले प्रयत्नों को सफल करते हुए घोर तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर अवतरित किया था। या यूं कहें कि पितरों के उद्धार के लिए गंगा को धरा पर प्रवाहित कराया उसी प्रकार न केवल मानव जाति के लिए, बल्कि मरुस्थल के जीवों की प्यास बुझाने, वनस्पतियों के लिए महाराजा गंगासिंहजी ने भगीरथी प्रयास किए और उनके द्वारा लायी गयी जीवनदायिनी गंगनहर की आज भी वही व्यवस्था बरकरार है।  ठाकुर महावीर सिंह तंवर दाऊदसर बताते हैं महाराजा गंगासिंहजी के प्रयासों से ही भारत के तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड इरविन ने 26 अक्टूबर 1927 को उद्घाटन की रस्म अदा की। आज इस दिन को हालांकि 94 वर्ष बीत गए हैं लेकिन आज भी महाराजा गंगासिंह जी द्वारा पानी की बूंद-बूंद को तरसने वाले मरुक्षेत्र को, मरुभूमि में पानी की कल्पना को साकार करने पर याद किया जाता है। जब उन्हेें [महाराजा गंगासिंहजी] को यह आभास हुआ कि मरुक्षेत्र का पूर्णतया भू-भाग वर्षा पर ही निर्भर है और इसकी कमी महसूस हो रही है जिससे क्षेत्र के लोगों का पलायन होने लगा। तो उसकी पूर्ति के लिए न केवल ऐसे बेहतर प्रयास कर इसे साकार भी कर दिखाया।

..तो पता चला बीकानेर रियासत की दूर-दूर तक फैली हुई जमीन की सिंचाई करना संभव

ठाकुर महावीर सिंह तंवर दाऊदसर बताते हैं रियासतकालीन समय में 1903 में महाराजा गंगासिंहजी ने मुख्य अभियंता ए. डबल्यू.ई. स्टेंडली की सेवाएं प्राप्त कीं। इन्होंने इस बात का प्रतिपादन किया कि सतलज नदी के पानी से बीकानेर रियासत की दूर-दूर तक फैली हुई जमीन की सिंचाई करना संभव है। इसी बची 1905 में केंद्र सरकार के अनुरोध पर आर. जी. केनेडी ने जो पंजाब के तत्कालीन मुख्य अभियंता थे, प्रथम सतलज घाटी परियोजना तैयार की, जिसके अनुसार बीकानेर रियासत की विस्तृत जमीन की सिंचाई की जा सकती थी, मगर पड़ौस की भावलपुर रियासत द्वारा कई आपत्तियों के उठाए जाने के कारण सन् 1906 तक कुछ नहीं हो सका। उस समय एक निर्णय लिया गया और उसके अनुसार एक योजना सन् 1912 में स्वीकृत हुई। फिर भी भावलपुर इस बात पर अड़ा रहा कि नदी-जल के उपयोग का लाभ केवल सरिता-तट-स्थित प्रदेशों द्वारा भी उठाया जा सकता है। भारत के तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड कर्जन ने 1906 में यह तय किया कि ''नदियों के जल का उपयोग, इस बात पर बिना ध्यान दिए कि वह एक भारतीय शासक की प्रजा है या वह ब्रिटिश राज्य क्षेत्र मेें रहती है, भारतीय जनता की सर्वोत्तम सुविधा हेतू किया जाना चाहिए।'' 

तब मरुभूमि की तकदीर बदलने के लिए 26 अक्टूबर को उद्घाटन की रस्म अदा, स्वयं महाराजा गंगासिंह जी ने खेत में जुताई की...

ठाकुर महावीर सिंह तंवर दाऊदसर यह भी बताते हैं भावलपुर रियासत की आपत्ति का इस कारण निराकरण कर दिया गया और एक दीर्घकालीन पत्र-व्यवहार के पश्चात् एक त्रि-पक्षीय परमर्शदात्री सभा (कांफ्रेंस) रखी गयी और एक इकरारनामा बनाया गया। इस पर 4 सितम्बर 1920 को हस्ताक्षर हुए मगर सन् 1905 के प्रस्तावों के अनुसार बीकानेर राज्य क्षेत्र के भू-भाग अर्थात् 1, 80, 0000 एकड़ को अंतिम परियोजना में 1000 वर्ग मील तक परीसीमित कर दिया गया। फिरोजपुर में नहर मुख्य कार्यस्थल का शिलान्यास 5 दिसम्बर 1925 को किया गया और नहर का काम सन् 1927 में 89 मील लम्बी आस्तरयुक्त नहर को बनाकर पूरा कर दिया गया। भारत के तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड इरविन ने 26 अक्टूबर 1927 को उद्घाटन की रस्म अदा की और 1927 में गंगनहर के उद्घाटन मौके पर बीकानेर के महाराजा गंगासिंहजी ने स्वयं खेत में जुताई की और पंडित मदन मोहन मालवीय ने मंत्र जाप किया।