दस धर्मो में क्षमा का पहला स्थान, करें सबसे क्षमा-सबको क्षमा :  आचार्यश्री शिवमुनिजी


 


 


जैन कांफ्रेंस के 114 वर्षों के इतिहास में प्रथम बार विश्व स्तर पर चतुर्विध संघ की उपस्थिति में ऑनलाइन आयोजन


बेंगलुरु। श्री आल इंडिया श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन कांफ्रेंस के तत्वावधान में ध्यान गुरु, श्रमण संघीय आचार्य सम्राट डॉ श्री शिवमुनिजी महाराज एवं सभी श्रमण संघीय गुरु भगवंतों के पावन सान्निध्य में पहली बार ऑनलाइन विश्व मैत्री क्षमापना दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर श्रमण संघ के युवाचार्यश्री महेंद्रऋषि जी महाराज, उपाध्यायप्रवर श्री विशालमुनिजी 'वाचनाचार्य',  श्री जीतेन्द्रमुनिजी, श्री प्रवीण ऋषिजी, श्री रविंद्रमुनिजी, प्रवर्तकश्री कुंदनऋषिजी, राजेंद्रमुनिजी, सुकनमुनिजी, महामंत्रीश्री सौभाग्यमुनिजी 'कुमुद', मंत्रीश्री शिरीषमुनिजी, सलाहकारश्री रमणीकमुनिजी, सहमंत्री श्री शुभममुनिजी, उपप्रवर्तक श्री पारसमुनिजी, श्रीपंकजमुनिजी, अमृतमुनिजी,  समकितमुनिजी, श्रीकपिलमुनिजी आदि संत वृन्द, महासाध्वी प्रवर्तिनीश्री चंदनाजी, ज्ञानप्रभाजी, सरिताजी, सुप्रभाजी, श्रीसुधाजी, उपप्रवर्तिनीश्री प्रतिभाकवरजी आदि साध्वीवृन्द उपस्थित थे।  आचार्यश्री शिवमुनिजी ने महापर्व पर्युषण महापर्व संवत्सरी की आराधना करते हुए चतुर्विध संघ से अंतर ह्रदय से क्षमा याचना करते हुए अपने मंगल सन्देश में फ़रमाया कि क्षमा के बिना तप, जप, साधना व ध्यान अधूरा रह जाता हैं। दस धर्मो में क्षमा का प्रथम स्थान हैं। हमें भगवान् महावीर की क्षमा के वचन को याद करना चाहिए। सब आत्मायें समान हैं कोई छोटा नहीं व कोई बड़ा नहीं। तीर्थंकर भगवन की साधना से या सद्गुरु के उपदेशों से मनुष्य जानता हैं कि मैं आत्मा हूँ, शरीर नहीं और मुझे मोक्ष में जाना हैं। भेद विज्ञान की साधना भगवान् महावीर की साधना हैं, महावीर ने गणधर गौतम को भेद विज्ञान बताया तथा आत्म का बोध दिया।वे बोले, खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे। मित्तिमे सव्व भुएस्‌ वैरं ममझं न केणई अर्थात सभी प्राणियों के साथ मेरी मैत्री है, किसी के साथ मेरा बैर नहीं है। भगवान महावीर ने क्षमा यानी समता का जीवन जीया। चाहे कैसी भी परिस्थिति आई हो, सभी परिस्थितियों में वे सम रहे। सम्यक्चारित्र की आराधना क्षमा भाव से - क्षमापना कर्तव्य का पालन करने से ही हो सकती है। अंतिम लक्ष्य मोक्ष का हैं। उन्होंने कहा कि ‘क्षमा वीरों का भूषण है ’- महान व्यक्ति ही क्षमा ले व दे सकते हैं। सबसे क्षमा मांगो सबको क्षमा करो किसी से किसी प्रकार का बैर न रखे क्योंकि क्षमा ही मोक्ष का द्वार हैं। आचार्यश्री ने जैन कांफ्रेंस द्वारा के व्यापक स्तर पर ऑनलाइन आयोजन की सराहना की। इस अवसर पर उपस्थित सभी मुनिवृन्द ने भी क्षमा के महत्व पर प्रकाश डाला। जिनवाणी के माध्यम से अपनी-अपनी बात रखी। इस अवसर पर जैन कांफ्रेंस के  पूर्व राष्ट्रिय अध्यक्ष नेमीचंद चोपड़ा, केसरीमल बुरड़, अविनाश चोरडिया, मोहनलाल चोपड़ा ने सभी से क्षमायाचना की। राष्ट्रीय पदाधिकारी और बड़ी संख्या में देश के विभिन्न प्रांतीय शाखाओं से पदाधिकारी एवं सदस्य ऑनलाइन उपस्थित थे।  जैन कांफ्रेंस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पारस मोदी ने जैन कांफ्रेंस परिवार कि और से सभी से क्षमा याचना की और कहा कि जैन कांफ्रेंस आज ऑनलाइन, सोशल मीडिया के माध्यम से अनेक धार्मिक कार्यक्रम के आयोजन कर रही हैं और इसी कड़ी में आज का कार्यक्रम भी आयोजित किया गया हैं। राष्ट्रीय महामंत्री पिंटू कर्णावट बोले कि  इस विशाल स्थानकवासी संप्रदाय की मातृ संस्था के कार्यभार संभालते हुए भूल होना सहज हैं, उन्होंने इस दिशा में जाने अनजाने से हुई भूलों की क्षमापना की। कार्यक्रम के संयोजक जैन कांफ्रेंस के राष्ट्रीय मंत्री सुनील सांखला जैन ने अपने वक्तत्व में कहा कि श्रमण संघ के विद्वान आचार्यश्री डॉ शिवमुनिजी के सान्निध्य में जैन कांफ्रेंस के 114 वर्षों के इतिहास में प्रथम बार विश्व स्तर पर चतुर्विध संघ की उपस्थिति में यह पावन विश्व मैत्री - क्षमापना दिवस का कार्यक्रम आयोजित हुआ। जिसका पहली बार पुरे विश्व में सीधा प्रसारण भी किया गया। उन्होंने आचार्यश्री एवं सभी श्रमण संघीय पदाधिकारी मुनिराज, साधु-साध्वीवृन्द के प्रति आभार एवं कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि आज कोरोना महामारी के कारण पुरे भारत से विभिन्न स्थलों पर विराजित संतो को एक मंच पर पधारने और उनके मुखारविंद से मंगल वाणी श्रवण करने का लाखों श्रदालुओं को अवसर मिला और क्षमा की महिमा को जाना।  कार्यक्रम के प्रारंभ में श्रीमती छाया मोदी द्वारा मंगलाचरण हुआ। स्वागत गीत वैशाली एवं पूनम मोदी ने प्रस्तुत किया। जैन कांफ्रेंस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पारस मोदी ने सभी का स्वागत किया एवं संचालन भी किया। कार्यक्रम संयोजक एवं जैन कांफ्रेंस के राष्ट्रीय मंत्री सुनील सांखला जैन ने धन्यवाद ज्ञापित किया।


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