संसार हो या धर्म, हर एक क्षेत्र में नियम तो होते ही है : आचार्यश्री भव्यदर्शनजी







संजय जोशी


बेंगलूरु। यहां राजाजीनगर इंडस्ट्रियल टाउन स्थित श्रीविमलनाथ जिनालय परिसर मेें विराजमान आचार्यश्री विजय भव्यदर्शनसूरिजी म.सा. ने रविवार को अपने धर्मसंदेश में कहा कि आपका रिश्ता किससे ज्यादा है? पुण्य से या पाप से? आपका ज्यादा समय किसमें जाता है? पुण्य में या पाप मेें? आपको ज्यादा मजा किसमें आता है? पुण्य के कार्यों करने में या पाप के कार्यों को करने में? आपका धन किस कार्य में ज्यादा व्यय होता है? पुण्य (सुकृतों) में या पाप (दुष्कृत्यों) में? आपके मन-वचन-काया का उपयोग धर्म में ज्यादा होता है या अधर्म में? उन्होंने कहा कि इन सब प्रश्नों के जवाब जब मुझे मिलता है तब लगता है कि पाप का ही पलड़ा भारी रहेगा। पापों में हुआ व्यय दुर्व्यय कहा गया है। जबकि पुण्य में सत्कार्यों में किया व्यय सद्व्यय कहा जाता है। दुर्व्यय से दुर्गति और सद्व्यय से सद्गति सहज सुलभ बन जाती है। आचार्यश्री बोले, सामान्य से कहा जाएगा कि सद्गति में सुख की और दुर्गति में दु:ख की मात्रा ज्यादा होती है। यह बात सच है क्योंकि नजरों में ऐसा ही दिखता है। अनुभव के तौर पर रही चीज का निषेध कोई नहीं करता है। आचार्यश्री ने कहा कि सब जीवों को सुख पसंद है लेकिन सुख को देने का सामर्थ्य जिसमें है वैसा धर्म इतना पसंद नहीं है। दूसरी ओर देखें तो यह भी नजर आता है कि दु:ख सबको नापसंद है फिर भी दु:ख देने वाला पाप आनंद के साथ, पूरी ताकत झोंक के करता है। उन्होंने कहा कि हर एक मजहब में कहीं पर पुण्य नहीं करने की प्रतिज्ञा (नियम) करने की बात नहीं बतायी है। उन्होंने कहा कि धर्म तो प्रेरणा दे देकर करवाना पड़ता है यानी पुण्य-सत्कार्यों के लिए नियमित उत्साह बढ़ाने के लिए सतत् प्रेरणा देना पड़ता है। पाप तो अनादिकाल से अभ्यस्त होने के कारण होता ही रहता है। उसके लिए कभी किसी की प्रेरणा जरुरी नहीं है। हां, पाप को रोकने के लिए प्रेरणा जरुर देनी पड़ती है। सिर्फ प्रेरणा से भी कार्य नहीं बनता, इसलिए नियम-पच्चकखाण करवाना पड़ता है। मन विचलित हो जाने की संभावना के चलते नियम जरुर ब्रेक लगाता है। नियम का एक निजी विशिष्ट प्रभाव भी है। संसार हो या धर्म, हर एक क्षेत्र में नियम तो होते ही है। आचार्यश्री भव्यदर्शनजी ने कहा कि एक बात यह भी समझने जैसी है कि बिना धर्म (सुकृत-पुण्य) कभी सुख मिलने की कतई संभावना नहीं है। उसी तरह बिना पाप-दुष्कृतों दु:ख नहीं आता है। अगर आपको दु:ख अनिष्ट है और सुख इष्ट है तो आप ही सोचकर रास्ता चुनें कि मुझे क्या करना है? नेता के चुनाव में चुनने में गड़बड़ हो तो परिणाम नकारात्मक ही आता है। उसी तरह यह रास्ता चुनने में गड़बड़ या गलती हो गयी परिणाम क्या आएगा ? यह सोचना होगा। समझ-सोच के साथ रास्ता तय करें ताकि दु:खी होने की बारी न आएं।


संयमपर्व का अभिषेक जारी..


आचार्यश्रीजी के 43वें संयमपर्व के उपलक्ष्य में तीन दिवस तक लगातार अखंड अभिषेक का विधान विविध प्रभावशाली स्तोत्रों के माध्यम से रविवार को भी हुआ।अभिषेक ट्रस्टी दिनेश भाई नगरिया, हर्षिल भाई शाह एवं हितेश भाई ने किया।  स्तोत्र पाठ आचार्यश्री ने किया। इस दौरान श्रमणीवृन्द की भी उपस्थिति रही।

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